Friday, April 16, 2010

अब अधिक इससे मेरे मत करो टुकड़े जो समेटना कभी चाहा तो फिसलूंगी मुट्ठी से

7 comments:

''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल said...

अलसाई आँखें,कुछ नींद बाकी है अभी
आज दिन भर के काम की सूचि बनाऊँ
इतने कोई बोला गरम चाय
APNI MAATI
MANIKNAAMAA

सहज समाधि आश्रम said...

क्या बात है मगर इन फ़ोटोज के साथ कुछ
कमेट या कवित्त अभिव्यक्ति जुडी होती तो
खूबसूरती में चार चांद वाली बात होती

अरुणेश मिश्र said...

प्रशंसनीय ।

KK Mishra of Manhan said...

सुन्दर प्रयास, किन्तु तस्वीरों के साथ-साथ शब्दों का तड़का हो तो बेहतर होगा
हिन्दी लेखन के लिए आप को शुभकामनायें
संपादक
दुधवा लाइव
http://dudhwalive.com

Patali-The-Village said...

सुन्दर प्रयास|

Unknown said...

शुक्रिया।

Amit K Sagar said...

वाह! इक़ छोटी सी लाइन में कितना जादा और गहरा कह दिया है.
शुभकामनाएं. शुक्रिया. जारी रहें.
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कुछ ग़मों के दीये