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Friday, April 16, 2010
अब अधिक इससे मेरे मत करो टुकड़े जो समेटना कभी चाहा तो फिसलूंगी मुट्ठी से
अभी इतनी सीढियाँ चढ़नी बाकी है
Friday, March 28, 2008
अलिंद,बलराम और ज्ञान जी के साथ कोलकाता में
इतिहास स्तम्भ ग्वालियर का 'गुजरी महल'
वागर्थ युवा - कविता 2007 (भारतीय भाषा परिषद् ,कोलकाता )
मानसिंह महल(ग्वालियर)
हम हैं राही प्यार के हम से कुछ न बोलिए
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भूली बिसरी यादें ...........
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नताशा
बात बोलेगी हम नहीं भेद खोलेगी बात ही
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